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देखें कितने चाहने वाले निकलेंगे - तारिक़ क़मर


Dr-Tariq-Qamar

देखें कितने चाहने वाले निकलेंगे 


देखें कितने चाहने वाले निकलेंगे 
अब के हम भी भेस बदल के निकलेंगे 

चाहे जितना शहद पिला दो शाख़ों को 
नीम के पत्ते फिर भी कड़वे निकलेंगे 

पैर के छाले पूछ रहे हैं रहबर से 
इक रस्ते से कितने रस्ते निकलेंगे 

इस लहजे से बात नहीं बन पाएगी 
तलवारों से कैसे काँटे निकलेंगे 

तख़्त छिनेगा दरबानों की साज़िश से 
और लुटेरे ताज पहन के निकलेंगे 

इक आईना कितनी शक्लें देखेगा 
मक्कारी के कितने चेहरे निकलेंगे 

गिर्द-ओ-पेश को थोड़ा रौशन होने दो 
मेरी घात में मेरे साए निकलेंगे 

'तारिक़' तेरी क़िस्मत में ही प्यार नहीं 
इस बैरी के बैर भी खट्टे निकलेंगे 


  • तारिक़ क़मर

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